महारानी तपस्विनी बाई
बहादुरों जब भारत माता बंदी हो,
तुम्हें चैन से सोने का हक नहीं।
नौजवानों उठो भारत भूमि को
फिरंगियों से मुक्त कराओ।
ऐसे शब्द शक्ति का संचार, जिसने भारतीयों के रग-रग में देश भक्ति की भावना को भर दिया; सोए हुए को जगा दिया और साधारण जीवन को तपस्वी बना दिया, वह थीं महारानी तपस्विनी।
महारानी तपस्विनी बाई झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की रिश्ते में भतीजी और उनके एक सरदार पेशवा नारायण राव की पुत्री थीं। सन् 1857 की क्रांति में इन्होंने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, विशेष रूप से जनक्रांति के लिए पूर्व-पीठिका तैयार करने में।
महारानी तपस्विनी बाई का जन्म सन् 1842 बेलूर, कर्नाटक में हुआ। वह एक बाल विधवा थीं। उनके बचपन का नाम सुनन्दा था। बचपन से ही उनमें राष्ट्रप्रेम की भावना भरी हुई थी. वह विधवा होने पर भी निराशा पूर्ण ढंग से जीवन को व्यतीत नहीं करती थीं. वह सदैव ईश्वर की आराधना में लीन रहती और साथ ही शस्त्र और शास्त्रों का अभ्यास भी करती थी. वह धैर्य तथा साहस की प्रतिमूर्ति थी.
सुनन्दा चंडी की उपासक थी. धीरे-धीरे उसमें शक्ति का संचार होता गया। वह घुड़सवारी में भी निपुण थी. उनके ह्रदय में देश को स्वतंत्र कराने की ललक थी। सुनन्दा स्वंय को शेरनी तो सरकार को हाथी समझती थी. जिस प्रकार शेर हाथियों से नहीं डरता है, वैसे ही सुनन्दा भी अंग्रेज़ों से नहीं डरती थी।
1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से कुछ समय पूर्व उत्तर भारत के सन्यासियों और पत्रकारों ने गाँव-गाँव, शहर-शहर घूमकर ‘लाल कमल’ को पहुँचाकर भावी क्रांति के लिए प्रेरित किया। इन सबके पीछे महारानी तपस्विनी की ही प्रेरणा थी। उन्होंने साधुओं व फकीरों को उनके पूजा-पाठ करने के स्थान पर देश के धर्म को भ्रष्ट करने वाले और भारतीयों को गुलाम बनाने वाले अंग्रेजो के विरुद्ध क्रांति करने के लिए प्रेरित किया और उनके हाथ में शस्त्र पकड़ा दिए।
अंग्रेजों को भारत भूमि से उखाड़ फेंकने की इच्छा ने उन्हें शस्त्र विद्या में निपुण बना दिया था। पिता भी उनके इस संकल्प से अत्यंत खुश थे। पिता की मृत्यु के बाद सारा दायित्व भी उनके कंधे पर आ गया। वह सिपाहियों की नई भर्ती और उन्हें आदेश देने में व्यक्तिगत रूचि लेने लगी। उन्होंने अंग्रेज़ों के विरुद्ध तैयारियां शुरू कर दीं।
अंग्रेज़ो को उनकी इन गतिविधियों का पता चल गया और उन्हें पकड़कर त्रिचनापल्ली के किले में नजरबंद कर दिया। वे सिर्फ सबक सिखाना चाहते थे कि कुछ ही दिन में औरत के होश ठिकाने आ जाएँगे और वह चुपचाप बैठ जाएगी। परंतु उनकी यह सोच गलत साबित हुई।
वहाँ से छूटते ही रानी उत्तर प्रदेश में सीतापुर के पास नैमिषारण्य तीर्थ चली गईं। वहां उन्होंने संत गौरीशंकर से दीक्षा प्राप्त की।
अंग्रेजों ने समझा कि रानी ने वैराग्य धारण कर लिया है इसलिए अब कोई खतरा नहीं है, परंतु रानी यह सब अपने लक्ष्य तक पहुंचने के लिए कर रही थीं। वह लंबे समय तक शिव और शक्ति की आराधना में लीन रहने रहने लगी। आसपास के लोगों के अंदर उनके प्रति श्रद्धा और भक्ति का भाव भर गया था। यहीं उन्हें माता तपस्विनी का नाम मिला। इस नाम ने उनकी पहचान को और ज़्यादा गुप्त बना दिया। दर्शन के लिए आने वाले भक्तों को वह आध्यात्मिक ज्ञान देने के साथ-साथ देशभक्ति की भावना से भरती थीं। भारत मां की स्वतंत्रता के लिए उन्हें प्रेरित कर उनमें ऊर्जा व शक्ति का संचार भी करती। इस प्रकार उन्होंने लाल फूल देकर साधु-संतों का भी एक बड़ा दल तैयार कर लिया था जो घूम-घूम कर क्रांति का संदेश सुनाते थे और जन समुदाय को तैयार करते हुए कहते – “अंग्रेज़ तुम्हारा देश हड़पकर भी संतुष्ट नहीं हो रहे हैं। वे तुम्हारे धर्म को भी भ्रष्ट करना चाहते हैं। धीरे-धीरे सभी को ईसाई बना देंगे। तुम्हें गंगा मैया की सौगंध, माता तपस्विनी की सौगंध, जाग उठो और अंग्रेज़ों को देश के बाहर निकालने के लिए तैयार हो जाओ”। सामान्य जन भी इस प्रकार के उत्तेजक वचनों को सुन देशभक्तों का साथ देने के लिए शपथ लेते थे।
माता तपस्विनी गाँव-गाँव घूमकर अपने भक्तों को प्रेरित करने लगीं। धनी और जमींदार लोग माता तपस्विनी को श्रद्धा में भेंट स्वरूप धन देते थे और इस सहायता से गाँव-गाँव में हथियार बनाए जाने लगे।
माता तपस्विनी ने स्वयं एवं उनके भक्त साधु फकीरों ने जनक्रांति का संदेश इधर-उधर पहुँचाने में बहुत बड़ी भूमिका निभाई, अन्यथा संचार साधनों के अभाव में उत्तर व मध्य भारत में जो क्रांति संगठन बन पाया वह संभव ही ना हो पाता।
लाल कमल बाद में केवल सैनिकों को वितरित किया जाने लगा जनसाधारण संदेश के लिए प्रतीक रूप में चपाती एक हाथ से दूसरे हाथ में आगे बढ़ती जाती थी।
मुठभेड़ के समय माता तपस्विनी स्वयं घोड़े पर सवार होकर सारी व्यवस्था का निरीक्षण करती थीं। उन्होंने अपने छापामार दोस्तों के साथ कई फौजी ठिकानों पर हमला किया। उनके दल में मात्र साधु नहीं थे अपितु अस्त्र-शस्त्र से लैस अपने प्राणों को न्यौछावर करने वाले देशभक्त भी साधु रूप में साथ रहते थे। माता तपस्विनी गीता का संदेश सुनाकर नश्वर शरीर और अजर अमर आत्मा का परिचय देकर भारत माता के वीर सपूतों का उसकी रक्षा हेतु आह्वान करतीं।
अंग्रेजों की सुसंगठित शक्ति के आगे छापामार साधुओं का विद्रोह सफल नहीं रहा। उन्हें अंग्रेज़ों द्वारा पकड़ पकड़कर पेड़ों पर लटकाए जाने लगा। तोपों से उड़ाया जाने लगा।
तपस्विनी के पीछे अंग्रेज जासूस लगे थे। वह मात्र गांव वालों के श्रद्धा के कारण बच पा रही थीं। वह दुश्मन के हाथ ना लगे इसलिए बाद में नाना साहब के साथ नेपाल की ओर चली गईं। नेपाल पहुंचकर भी शांत नहीं रहीं। भारत की जनता के नाम उनके संदेश सदैव आते रहे कि वे घबराएं नहीं, “महिषासुर की तरह अंग्रेज़ हुकूमत का विनाश होगा। क्रांति की दुर्गा फिर प्रकट होगी।”
नेपाल में उन्होंने कई स्थानों पर देवालय बनवाए। धीरे-धीरे धर्म चर्चा के साथ क्रांति के अड्डे बन गए। नेपालियों में भी अंग्रेजो के विरुद्ध राष्ट्रीय भावना को जगाना उन्होंने प्रारंभ कर दिया। उसके बाद वे दरभंगा होते हुए 1890 में कोलकाता आ पहुंची। कोलकाता में उन्होंने 1893 में ‘महाकाली पाठशाला’ खोली और उन्होंने वहां अपने पुराने संपर्कों का लाभ उठाना शुरू कर दिया। मई 1897 में,स्वामी विवेकानंद ने महाकाली पाठशाला का भ्रमण किया और उनके महिला शिक्षा के विकास के लिए एक नया मार्ग स्थापित करने के प्रयास की सराहना की।
1901 में कोलकाता में वह बाल गंगाधर तिलक से मिली और उन्होंने नेपाल में शस्त्र कारखाना खोला। वहीं उन्होंने पुनः क्रांति का शंख फूँका और अपनी युक्त योजनाओं को उनके सामने रखा। स्वामी विवेकानंद को भी उन्होंने नेपाल राणा को अपना शिष्य बनाने और उनकी सहायता से भारत आजाद कराने की प्रेरणा दी। उन्होंने तिलक जी से पुनः संपर्क किया और उनके भेजे गए एक महाराष्ट्रीय युवक खाडिलकर को इसके लिए तैयार कर नेपाल भेजा।
खाडिलकर ने नेपाल के सेनापति चंद्र शमशेरजंग से मिलकर एक जर्मन फर्म क्रुप्स की सहायता से टाइल बनाने का कारखाना खोला पर वास्तव में वहाँ हथियार बनाए जाते थे। वे बंदूकें फिर नेपाल सीमा पर लाकर बंगाल के क्रांतिकारियों में वितरित की जाती थीं। खाडिलकर वहां कृष्णराव के गुप्त नाम से रहते थे और उन्होंने अपनी अच्छी सूझबूझ से नेपाली उच्चाधिकारियों के साथ अच्छे संबंध भी बना रखे थे। परंतु एक दिन एक सहयोगी ने विश्वासघात कर दिया और धन के लोभ में अंग्रेजों को यह सूचना दे दी। नेपाली सेना ने टाइल कारखाने को घेर लिया और हथियार बरामद कर लिए। खाडिलकर को भी अंग्रेजों के हाथ सौंप दिया गया। उन्हें बहुत यातनाएं दी गई परंतु अंत तक उन्होंने माता तपस्विनी का हाथ होने का संकेत तक नहीं दिया। अतः कोलकाता में रहने वाली पाठशाला संचालिका माता तपस्नी पर उनका ध्यान नहीं गया। इस तरह माता तपस्विनी ने पहले महाराष्ट्र बंगाल के बीच संपर्क सूत्र जोड़ा फिर बंगाल और नेपाल के बीच और किसी को इसकी खबर नहीं लगने दी।
माता तपस्विनी बहुत बृद्ध हो चुकी थीं। उनकी अंतिम क्रांति योजना भी सफल न हो पाई। वह बहुत टूट गई थीं। अपने ही देशवासियों में से कुछ विश्वासघाती सारी योजनाओं को विफल कर कर रहे थे और क्रांति-सैनिकों के लिए अपार कष्टों का कारण बन रहे थे – इस बात से उन्हें बहुत कष्ट था। वह कहती थीं – ‘यह भारत का हतभाग्य है। ईश्वर इसी का दंड हम भारतवासियों को दे रहा है।’
जीवन भर संघर्षरत रहते हुए, दुर्गा के समान निडर होकर लड़ते हुए, स्वतंत्रता की लौ जलाकर सन् 1907 में महारानी तपस्विनी सदा के लिए ईश्वर में लीन हो गई।
ऐसी महान वीरांगना को शत्-शत् नमन्।
