‘गो’ से रक्षित “गोरखनाथ”
एक महान योगी, संत, धर्मनेता, जिन्होंने अपनी शक्ति और शिक्षा से एक ऐसे समाज को बदला जो झूठ, आडंबर, ऊँच-नीच, व्यभिचारिता आदि विकृतियों से ग्रसित था। उनकी महानता, जिसे संपूर्ण भारत पूजता है। भारत की प्रत्येक भाषा में उनकी कहानियाँ मिलती हैं। आज भी देश के हर कोने में उनके अनेक अनुयायी पाए जाते हैं। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी जी कहते हैं – “शंकराचार्य के बाद इतना प्रभावशाली और इतना महिमामण्डित महापुरुष भारत में दूसरा नहीं हुआ।” मात्र वह ही नहीं उनका नाम भी उतना ही प्रभावशाली व वंदनीय है, ‘गोरक्षनाथ’। जहाँ ‘गो’ है, वहाँ दिव्यता है! महानता है!
‘गोरक्ष’ संस्कृत भाषा का एक यौगिक शब्द है, जो ‘गो’ (गाय) और ‘रक्ष’ ( रक्षक) शब्दों से मिलकर बना है। अर्थात् गाय की रक्षा करने वाला ‘गोरक्ष’ है।
महाराष्ट्र की प्रचलित लोक कथा के अनुसार बंगाल प्रांत के चंद्रगिरी ग्राम में सरस्वती नामक एक ब्राह्मणी प्रतिदिन ईश्वर से संतान प्राप्ति की प्रार्थना करती थी। एक दिन सिद्ध-गुरु मत्स्येंद्रनाथ भ्रमण करते हुए उसी गाँव में पहुँचे। भिक्षा माँगते समय, सरस्वती के दुःखी होने का कारण पूछा। सरस्वती ने निःसंतान होने का जब दुःख प्रकट किया तो उन्होंने सूर्य-मंत्र से अभिमंत्रित विभूति खाने के लिए दी और आशीर्वाद देकर कहा कि मैं जन्मे पुत्र को उपदेश देने लिए 12 वर्ष बाद आऊँगा।
सरस्वती ने यह बात जब अपने पास की स्त्रियों को बताई तो उन्होंने योगी-साधु से संबंधित संदेहात्मक बातें करते हुए, सावधान रहने की बात कही और उसे विभूति खाने से मना कर दिया। सरस्वती इन बातों से डर गई और उसने वह विभूति पास के गोबर के ढेर (घूरा) पर डाल दी।
अपने वचनानुसार 12 वर्ष बाद मत्स्येंद्रनाथ पुनःआए और सरस्वती से बालक के बारे में पूछा। उसने पड़ोसी स्त्रियों की बातें बताईं और क्षमा माँगी। मत्स्येंद्रनाथ उस गोबर के ढेर के पास गए और आवाज दी – गोरक्षनाथ! तभी 12 वर्ष का एक सुंदर बालक उसमें से निकला और गुरु मत्स्येंद्रनाथ को प्रणाम किया। वह, गोरक्षनाथ को अपने साथ लेकर अपनी यात्रा में आगे चल पड़े।
एक पुरानी कहावत है – “बारह साल में घूरे के भी दिन फिर जाते हैं”, संभवतः इसी प्रसंग से प्रभावित होकर लोक प्रचलित हुई होगी।
महाराष्ट्र में गोरक्षनाथ को ‘गोवरनाथ’ भी कहा जाता है। महाराष्ट्र के अत्यंत पूजनीय ग्रंथ ‘नवनाथ भक्तिसार’ के दूसरे और नोवें अध्याय में इस सुंदर कथा का वर्णन मिलता है –
“हे हरिनारायण प्रतापवंता । मित्रवर्या सूर्यसूता । जरी अससील या गोवरांत निघ त्वरित या समयी ।।
या गोवंरगिरींत नरदेह जन्म। मिरवला असे तूतें उत्तम। तरी गोरक्ष ऐसे तूतें नाम। सुढाळपणी मज वाटे ।।”
इस कथा के अनुसार ‘गोरक्ष’ का एक अर्थ और भी निकाला जा सकता है कि गोमाता (गोबर) की रक्षा से जन्मा और पला-बढ़ा, गोरक्ष कहलाया। अतः, गुरु मत्स्येंद्रनाथ ने ‘गोरक्षनाथ’ कहकर उस बालक को पुकारा। इस प्रकार 12 वर्षों तक अपने गोबर से सुरक्षित रखने वाली, पालन-पोषण करने वाली अपनी गोमाता की रक्षा करना, उसके पुत्र का परम कर्तव्य है, अतः वह ‘गोरक्षनाथ’ कहलाए।
नाथ संप्रदाय के प्रतिपादक गोरक्षनाथ (गोरखनाथ) जिन्हें भगवान शिव का अवतारी भी माना जाता है, विद्वानों के मातानुसार उनका जन्म काल भिन्न-भिन्न माना गया है। ग्रंथों व साहित्य में सतयुग से कलयुग तक भिन्न समय में विभिन्न स्थानों पर उनका उल्लेख मिलता है।
गोरक्ष अपने उपदेशों में गाय को ज्ञान स्वरूप बताकर, इसे प्रतीक रूप में प्रयोग करते हैं।
“गगनि मंडल में गाय बियाई, कागद दही जमाया।
छांछि छांणि पिंडता पीवी, सिधां माखण खाया॥” (सबदी-197)
अर्थात् शिखा या सिर के ऊपरी मध्य भाग (गगन मंडल/सहस्रार) में जो ज्ञान उत्पन्न हुआ, उसे काग़ज़ की पोथियों में लिख दिया गया। पंडित बिना तत्व जाने उस ज्ञान को फोकट में पढ़ते रहे, परंतु सिद्धों ने उस ज्ञान के वास्तविक तत्व के आनंद को पाया है। अर्थात् पोथी के ज्ञान और आनंदमय ज्ञान की अनुभूति में बहुत अंतर है।
इसी प्रकार, गोरक्ष स्वयं को ग्वाला और गाय को ब्रह्म बताते हुए कहते हैं –
“गोरष लो गोपलं लो, गगन गाइ दुहि पीवै लो,
मही बिरोलि अंमी रस पीजै, अनभै लागा जीजै लो।।” (राग-रामग्री,1/21)
‘गोरक्षनाथ ग्वाला हैं। वह गाय को दुहकर पीते हैं अर्थात् आकाशमंडल में ब्रह्मानुभूति करते हैं। मट्ठे को मथकर वह अमृत का पान कर लेते हैं अर्थात् सार ग्रहण कर निस्सार का त्याग कर देते हैं।’
मांस-भक्षण का विरोध करते हुए वह कहते हैं –
“जीव सीव संगे बासा। बधि न षाड़बा रुध्र मासा।
हंस घात न करिबा गोतं । व कथंत गोरष निहारि पोतं ।।” (सबदी-227)
‘जीव और ब्रह्म एक साथ ही निवास करते हैं इसलिए हत्या करके रक्त-मांस का सेवन मत करो। प्राण-घात मत करो। सबको अपने ही गोत्र अथवा कुल का समझो। गोरक्ष कहते हैं, सब प्राणियों को अपने बच्चों (पोत, पूत, पुत्र) के समान देखो, वे सब उन्हीं जैसे हैं।’
वह मांस, मदिरा व भाँग के त्यागने की बात करते हैं –
“अवधू मांस भवंत दया धरम का नास। मद पीवत तहां प्रांण निरास ।
भांगि भषंत ग्यांन ध्यांन षोवंत। जम दरबारी ते प्रांणीं रोवंत ।।” सबदी-166)
अर्थात्, ‘हे अवधूतो ! मांस खाने से दया-धर्म का नाश होता है, मदिरा पीने से प्राण में नैराश्य छा जाता है, भाँग खाने से ज्ञान-ध्यान खो जाता है और ऐसे प्राणी यम के दरबार में रोते हैं।’
भारत के दक्षिण से उत्तर तक गोरक्षनाथ के पवित्र स्थल पाए जाते हैं। जहाँ-जहाँ गोमाता है, वहाँ उनकी रक्षा में गोरक्षनाथ कभी प्रत्यक्ष तो कभी अप्रत्यक्ष रूप में सदा विद्यमान रहते हैं। उत्तराखंड में नेपाल सीमा से लगे चंपावत जिले के तल्लादेश क्षेत्र में स्थापित गुरु गोरक्षनाथ का प्रसिद्ध मंदिर है। यह स्थान, चम्पावत-तामली मोटर मार्ग पर जिला मुख्यालय से 40 किमी. दूर एक पर्वत की ऊँची चोटी पर स्थापित है।माना जाता है कि सतयुग में गुरु गोरक्षनाथ ने यहाँ धुनी जलाई थी और तब से यह अखंड धूनी अनवरत प्रज्जवलित हो रही है। यह गोरक्षनाथ धाम गोरक्षक के रूप में भी पूजा जाता है। क्षेत्र में होने वाली फसल हो या दुधारू जानवरों का दूध, सबसे पहले यहाँ चढ़ाया जाता है। वहाँ के लोगों का कहना है कि चारों ओर से घिरे जंगलों के बीच इस क्षेत्र की रक्षा गुरु गोरक्षनाथ ही करते हैं। जंगली जानवरों से यहाँ के पालतू जानवरों और मुख्य रूप से दूध देने वाली गोमाता की रक्षा वह स्वयं करते हैं। इसलिए गोरक्षक के रूप में प्रतिदिन उनका दूध से अभिषेक किया जाता है और पूजा-अर्चना होती है।
गोमाता के संरक्षण में पले-बढ़े, ऐसे महान गोरक्षक ‘गोरक्षनाथ’ का प्रभाव सदा बढ़ता रहे। न मात्र गोसेवकों, अपितु प्रत्येक भारतवासियों पर उनकी अनुकंपा एवं उनके उपदेशों का प्रभाव, आशीर्वाद रूप में प्राप्त हो।
“गकारो गुणस्युंक्तो रकारो रूपलक्षणः ।
क्षकारेणाक्षयं ब्रह्म श्रीगोरक्ष नमोऽस्तु ते ।। (श्रीगोरक्षनाथ स्तोत्र)
ग-कार गुण से संयुक्त होना है, र-कार रूप का लक्षण है व क्ष-कार अक्षय ब्रह्म है ऐसे भगवान गोरक्ष को हमारा नमस्कार है।।”


