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स्वाधीनता के अज्ञात वीर : ‘स्वयं’ के रक्षक
जीवन आनंदमय है। आनंद की अनुभूति तब होती है जब आत्मसंतुष्टि होती है। जब साधक, त्याग और तप द्वारा ‘स्वयं’ की अनुभूति कर लेता है तब उसे यह भी ज्ञान हो जाता है कि ‘मैं’, ‘वह’ और ‘हम’ भिन्न नहीं है। दूसरे का कष्ट, स्वयं का लगता है। दूसरे का बंधन, अपना लगने लगता है। उसी कष्ट और बंधन से मुक्त कराने हेतु वह स्वयं का बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाता है। वहाँ कोई स्वार्थ नहीं होता, बस एक उद्देश्य होता है, ‘मुक्ति’।स्वयं की मुक्ति और आत्मानंद प्राप्त हेतु कितने ही वीरों ने इस मुक्ति के हवन में अपनी आहुति दे दी। उस हवन की ज्वाला में ही…


