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पथ पर मेरा जीवन भर दो – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’
पथ पर मेरा जीवन भर दो,बादल हे, अनंत अंबर के!बरस सलिल, गति ऊर्मिल कर दो!तट हों विटप छाँह के, निर्जन,सस्मित-कलिदल-चुंबित-जलकण,शीतल शीतल बहे समीरण,कूजें द्रुम-विहंगगण, वर दो!दूर ग्राम की कोई वामाआए मंद चरण अभिरामा,उतरे जल में अवसन श्यामा,अंकित उर छबि सुंदरतर हो!