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बलिदानी शीश
मज़लूमों की रक्षा हेतुप्राण त्याग को आतुर थे,हिंद के पीर, शूरवीरगुरु हरगोविंद सुत, तेग बहादुर थे। माँ ‘नानकी’, ‘गुजरी’ पत्नी कोब्रह्मज्ञान दे अलख जगाया,ऐसा पहली बार हुआ जबस्वयं शहीदी को कदम बढ़ाया। किया ऐलान – ‘धर्म न बदलेगा’सुन ले तू अब औरंगजेब!अपनाएंगे इस्लाम सभी जब,पहले अपनाएगा तेग!! बौखलाए दुष्ट ने पहलेभाई सिक्ख ‘मती’ कोआरे से कटवाया,देख न बदल रुख ‘तेग’ का,‘दयाला’ जिंदा जलाया,‘सती’ खोलते पानी में डलवाया। पग न हिला, वचन न डुला,दिया शीश बलिदान,वह ‘शीशगंज’ महान है,‘सिंह’ गुरु गोविंद फिर जग आयासर्वव्याप्त ‘परमात्म’ गुरुजैसे प्रकाशित भानु है।
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एक से सौ तक संख्यावाचक शब्दों का मानक रूप
एक दो तीन चार पाँच छह सात आठ नौ दस ग्यारह बारह तेरह चौदह पंद्रह सोलह सत्रह अठारह उन्नीस बीस इक्कीस बाईस तेईस चौबीस पच्चीस छब्बीस सत्ताईस अट्ठाईस उनतीस तीस इकतीस बत्तीस तैंतीस चौंतीस पैंतीस छत्तीस सैंतीस अड़तीस उनतालीस चालीस इकतालीस बयालीस तैंतालीस चवालीस पैंतालीस छियालीस सैंतालीस अड़तालीस उनचास पचास इक्यावन बावन तिरपन चौवन पचपन छप्पन सत्तावन अट्ठावन उनसठ साठ इकसठ बासठ तिरसठ चौंसठ पैंसठ छियासठ सड़सठ अड़सठ उनहत्तर सत्तर इकहत्तर बहत्तर तिहत्तर चौहत्तर पचहत्तर छिहत्तर सतहत्तर अठहत्तर उनासी अस्सी इक्यासी बयासी तिरासी चौरासी पचासी छियासी सतासी अठासी नवासी नब्बे इक्यानवे बानवे तिरानवे चौरानवे पचानवे छियानवे सतानवे अठानवे निन्यानवे सौ संदर्भप्रशासनिक शब्दावली, वैज्ञानिक तथा तकनीकी शब्दावली आयोग, मानव संसाधन विकास…
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मानक हिंदी वर्तनी
6 अनुस्वार (शिरोबिंदु/बिंदी) तथा अनुनासिकता चिह्न (चंद्रबिंदु) 6.0 अनुस्वार व्यंजन है और अनुनासिकता स्वर का नासिक्य विकार। हिंदी में ये दोनों अर्थभेदक भी हैं। अत हिंदी में अनुस्वार (ं) और अनुनासिकता चिह्न (ँ) दोनों ही प्रचलित रहेंगे। 6.1 अनुस्वार 6.1.1 संस्कृत शब्दों का अनुस्वार अन्यवर्गीय वर्णों से पहले यथावत् रहेगा। जैसे – संयोग, संरक्षण, संलग्न, संवाद, कंस, हिंस्र आदि। 6.1.2 संयुक्त व्यंजन के रूप में जहाँ पंचम वर्ण (पंचमाक्षर) के बाद सवर्गीय शेष चार वर्णों में से कोई वर्ण हो तो एकरूपता और मुद्रण/लेखन की सुविधा के लिए अनुस्वार का ही प्रयोग करना चाहिए। जैसे – पंकज, गंगा, चंचल, कंजूस, कंठ, ठंडा, संत, संध्या, मंदिर, संपादक, संबंध आदि (पंकज, गंगा,…
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देवनागरी लिपि तथा हिंदी वर्तनी का मानकीकरण
हिंदी भारतीय संघ तथा हिंदी-भाषी राज्यों की राजभाषा है। हिंदी भाषा की लिपि देवनागरी है। इसे नागरी लिपि भी कहते हैं। किसी भी भाषा के प्रचार-प्रसार को सरल बनाने के लिए यह जरूरी है कि उस भाषा का प्रयोग करने वाले सभी लोग एक ही तरह के अंक और वर्ण प्रयोग में लाएं। साथ ही, यह भी आवश्यक है कि शब्द विशेष को सभी लोग एक ही तरीके से लिखें। ऐसा न होने से भाषा में अराजकता आ जाती है और उसका कोई मानक रूप नहीं रह जाता। हिंदी के संदर्भ में इस कमी को दूर करने के लिए केंद्रीय हिंदी निदेशालय, भारत सरकार ने शीर्षस्थ विद्वानों आदि के साथ…
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त्योहार अपनी मिट्टी का
त्योहार अपनी मिट्टी कारंग और गुलाल काप्रेम का सौहार्द काखुशियों और उल्लास का।लाल-हरा ये नीला-पीलारंग गुलाबी सबसे रंगीलाधरा-गगन पर जब ये बिखरेबन जाएँ इंद्रधनुष ही कितने।मनमुटाव, रंजिशें गहरीभस्म कर देती होली की अग्निसूरज चिढ़ता आज देख नज़ाराफीका उसका रंग होली ने कर डाला।होती नयी सुबह गले से गले मिलचारों ओर ढोल-बाजे की धुनगुजिया, हिस्से, लड्डू की मिठासघुल जाती हर मन में, बढ़ जाती आस।रंग आज नहीं पिचकारी में तो क्याभर लो इन्हे अब अंतर्मन मेंडालो सबके सुंदर मन मेंऐसा अद्भुत रंग चमकेगाजैसे नाचे मोर बिखेर पंख वन में। 29,मार्च 2021 राजस्थान पत्रिका, चेन्नई में प्रकाशित
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संघर्ष ही शक्ति
बिखरी लालिमा नभ-धरा परबढ़ते कदम सब थम गए,जो जहाँ थे खड़े वहीं परसबके सब पिघल गए ।कोई घर से दूर तो कहींमाँ-बाप की चिंता सता रही,मिलने की है आस परनिराशा हाथ आ रही ।कुछ ऐसा मंजर बदल गयाघर के अंदर सब ढल गया,जन्मा ऐसा राक्षस जग मेंनिगल रहा दुर्बल को पल में।हाहाकार यूँ मच रहाजिसको छुआ वो सिहर रहा,जीवनभर जिसने साथ दियातन वह लावारिस हुआ ।हर रिश्ता अब दूर हुआहालात से मजबूर हुआ,बच्चों की हँसी गुम हो गईचार दीवारों में फँस गई ।रोज़ आमदनी पर जो निर्भरजीवन हुआ बहुत ही दुर्लभ,ठहर गया ये मानव जीवनप्रतीक्षा में बैचेन हुआ मन।हवा भी विषमुक्त हो गईप्रकृति सबसे कुछ तो कह रही,पशु-पक्षी स्वतंत्र हो…
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सृष्टि की श्रेष्ठ रचना
नारी एक ऐसा रहस्य है जिसे सभी ने अपने -अपने दृष्टिकोण से जानने का प्रयास किया। वेद-पुराणों और शास्त्रों में उसका स्थान सर्वोपरि बताया गया है।“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”जननी और जन्मभूमि का स्थान स्वर्ग से भी श्रेष्ठ एवं महान है। वह संपूर्ण सृष्टि में एकमात्र ऐसी रचना है जो प्रेम, करुणा, दया, धैर्य, सहनशीलता, क्षमा आदि सद्गुणों से पूर्ण है। जिसे वह अर्जित नहीं करती अपितु यह उसके मूल प्रवृति में समाहित होते हैं। वह इन गुणों के साथ जहां भी वास करती है वह स्थान पवित्र, सुखमय, आनंदपूर्ण, वैभवशाली, समृद्धि, शांतिपूर्ण में परिवर्तित हो जाता है। नारी अपने इतने रूपों को धारण करती है कि संसार में उसके समान…
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संत साहित्य की वर्तमान प्रासंगिकता (संत रामानन्द)
संत रामानन्द कहते हैं अति किसी की भी अच्छी नहीं होती, बदलाव संसार का नियम है…. ऐसे ही एक बदलाव की आवश्यकता थी समाज को जब जाति-पाँति, ऊंच-नीच, छुआ-छूत जैसी बीमारियों ने चारों ओर अपने पैर फैला लिए थे। सांप्रदायिकता, धर्म- अधर्म और धर्म बदलाव जैसे घातक विचार से समाज ग्रसित हो रहा था। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है;यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत ।अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम् ॥१धर्म की हानि हो और ईश्वर चुपचाप देखता रहे, ऐसा असंभव है! अतः समाज में बदलाव होना ही था और इस बदलाव का बीज बोया संत रामानंद जी ने, जो ईश्वर के अवतार रूप में प्रकट हुए। बुद्ध हो या महावीर,…
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अपने दम पर
करना हो कुछ,अपने दम पर करो !दूसरों पर भरोसा,थका देगा, हरा देगा,अपने दम पर हीरास्ता तय होगामंजिल तक पहुंचने का । साथ,बीच में छूट जाएगातुम्हें भटकाएगा,रह जाओगे अकेलेकिसी सुनसान वीराने में,जहाँ स्वयं को ढूंढ़नाआसान न होगा ।
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दो शब्द नहीं…
















