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“अच्छा ही होगा”
राधा और शिवा दोनों भाई बहन रेलवे स्टेशन जाने के लिए बस में चढ़े l वे दोनों ही बहुत घबराए हुए थे क्योंकि रेल छुटने का समय और बस स्टॉप से स्टेशन पहुंचने का समय लगभग समान ही था l वे सोच में थे की रेल पकड़ भी पाएंगे या नहीं l बस से उतरते समय एक दिव्यांग ने शिवा से मदद मांगी कि वह स्टेशन तक पहुंचा दे l शिवा ने कुछ सामान अपने कंधे पर लादा और कुछ राधा को देकर, आगे बढ़े l राधा ने एक बार शिवा से कहा भी कि हम लोगों को रेल मिलना बहुत मुश्किल है और इतनी भीड़ में कैसे इस दिव्यांग…
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प्रेम
प्रेम फूलों से हर किसी को एक बार कांटे से भी कर लो चुभन तुम्हारी दूर न कर दूं तो कहना…. प्रेम बरसात से हर किसी को एक बार सूखे से भी कर लो न चाहत का एहसास दिला दूं तो कहना…. प्रेम हवाओं से हर किसी को एक बार निर्वात से भी कर लो न शांत स्वरुप दिखा दूं तो कहना…. प्रेम नदियों से हर किसी को एक बार नाले से भी कर लो न दुख का एहसास दिला दूं तो कहना…. प्रेम नरम दिल से हर किसी को एक बार पत्थर दिल से भी कर लो ताकत से तुझे न भर दूं तो कहना…. प्रेम परमात्मा से सबको…
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शारदे वंदना
शुभ वाणी शुद्ध विद्या, शुद्ध चित्त प्रदायिनी ! सदा धरूँ तेरा ही ध्यान, है सर्वबाधा विनाशिनी !! जय जय शारदे माता जय जय शारदे माता । जय जय शारदे माता जय जय शारदे माता ।। वीणावादिनी तू ही, पुस्तक धारिणी तू । कमलासनी तू ही, हंस विराजिनी तू ।। जय जय शारदे… ।। मैं मूरख अज्ञानी, मन में तमस भरा । बिनती सुन ले माता, ज्ञान का दीप जला ।। जय जय शारदे..।। मूढ़ता हरके मेरी, बुद्धि प्रदान करो । जिह्वा कवित्व हो माता, विद्या तर्क भरो ।। जय जय शारदे… ।। तू कल्याणी शक्ति, जीवन दायनी तू । दया दृष्टि कर माता, क्षमा दायनी तू ।। जय जय शारदे……
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*अंधेरा*
उजाले की चाहत तारों सी चमचमाहट सूरज का तेज हर किसी को पाने की तमन्ना, परंतु मुझे अंधेरों से प्यार l उसका आत्मविश्वास कि सूरज का तेज उसके अस्तित्व को बनाए रखेगा, अंधेरा विस्मय हो या सूरज अस्तमय उसे गर्व है कि रोशन उसका ही जहां होगा जब प्रभात की सुनहरी लालिमा में तिल – तिल घुलेगा, लौटेगा फिर अपने जहां में कुछ खोने का भय ना होगा l इस रोशन जहां में जागने की बात सब करते हैं जहां प्रकाश वाह्य आवरण छूती है, मैं तो वह अंधेरा हूं जो अंधेरे में ही सबको रोशन करती हूं l मेरे बिना उसका वजूद ना होगा, नकारते हो मुझे, दुत्कारते हो…
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“सब अपने हैं”
राहुल हमेशा चीनू के यहां जाने की जिद करता था परंतु राहुल की मां हमेशा उसे जाने के लिए डांट कर मना कर देती थी l चीनू के बार – बार आग्रह करने पर इस बार राहुल से रहा नहीं गया और मां को बिना बताए चला गया l देर होने के कारण मां बहुत चिंता में सोच रही थी कि आखिर आज इतनी देर कैसे हो गई? कुछ देर बाद राहुल हंसते – खेलते घर की ओर आ ही रहा था कि मां दूर से ही देख राहुल पर बरस पड़ी l राहुल ने अपनी मां से कहा; आप मुझे हमेशा गलत बताती आईं हैं…. कि वह स्लम एरिया…
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*आखिर कब आओगे*
त्रेता बीता, द्वापर बीता, कलयुग ने पांव पसारा है, आखिर कब आओगे सतयुग मेरे? चहुंओर विकृत नजारा है l अत्याचार, व्यभिचार, वासनाओं… का अब यहां रेला है, पग-पग छलता मुखड़ा जो पहने सज्जनता का चोला है l कलयुग ने पांव पसारा है, आखिर कब आओगे सतयुग मेरे? चहुंओर विकृत नजारा हैl ईर्ष्या -द्वेष, घृणा… वश मन ने मानव हृदयाघात खेला है, प्रेम स्वार्थ पर टिका हुआ ‘मैं’, ‘मेरा सब’ का मेला है l कलयुग ने पांव पसारा है, आखिर कब आओगे सतयुग मेरे? चहुंओर विकृत नजारा है l
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शिक्षा
शिक्षा कुछ करना सिखाती है आगे बढ़ना सिखाती है गलत से लड़ना सिखाती है मातृभूमि पर मरना सिखाती है भेदभाव मिटाती है प्रेम का दीप जलाती है मदद का भाव जगाकर सबको अपना बनाती है । महत्व सबसे बड़ा है जीवन में इसका, ना जाने कौन सा दिन अंत हो किसका । कुछ करके ही जाना है, जाने से पहले कुछ पाना है । ऐसा कर जाओ मेरे साथी ना आपसी द्वेष हो ना जाति- पाँति का निशान हो, बस दिलों में प्यार और चेहरे पर मुस्कान हो।
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पापा की परछाई
पापा की प्यारी होती है पर बेटी तो पराई होती है। रंगों से पहचान कराया आँखों में दुनिया का रंग दिखाया जब गिर रही थी हाथ देकर अपना मुझे फिर से उठाया उम्मीद की राह पर फिर से चलना सिखाया… उठ खड़ी हुई लड़खड़ाते कदम से उस हाथ ने मुझे खड़े होने की ताकत दी जो सदैव मेरे सिर पर था कदम बढ़ाया उस राह में जहाँ मुझे जाना था तैरना न आता था! पता नहीं था बिना पुल के नदी का पार कैसे पाना था… आँखें खुली तो पाया एक ऐसे स्थान पर जहाँ से मैं अनजान शायद यहीं ईश्वर को पहुंचाना था कड़क धूप में खड़ी बीच राह…
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सुहानी शाम
सुहानी शाम की बातें कैसे आज मैं भूलूं वे कितनी प्यारी होती थीं। जब बैठते थे एकजुट हो अपने आंगन में, दिल के हालचाल की बस यहां तो बातें होती थीं, कभी पकौड़े, कभी समोसे साथ में चाय की प्याली भी होती थी। सुहानी शाम की बातें कैसे आज मैं भूल वे कितनी प्यारी होती थीं। समय था दर्द बांटने को उस शाम के मंजर में, दिलों से दूरियां मिटाने की यहां तो बातें होती थीं, कभी तू हंस ले कभी मैं रो लू, वह जज़्बातों की मुलाकातें भी होती थीं। सुहानी शाम की बातें कैसे आज मैं भूलूं वे कितनी प्यारी होती थीं। आज हर शाम में उस शाम…
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प्रथम गुरु
माँ ….. शब्द में ही पवित्रता मेरे जन्म के लिए कितनी प्रार्थनाएं की फिर नौ महीने मेरी सलामती की साधना की आंखें मेरी खुली तो जैसे स्वर्ग उसने पाया देख मुझे उसकी ह्रदय में मामृत आया काजल का टीका लगाकर कुदृष्टि से मुझे बचाया रातों में जागकर मुझे सुलाती, लोरी सुनाती…. देख मुझे बस खूब हर्षाती रोना ना वह मेरा सुन पाती छोड़ के काम भागती आती अम्मा बाबा चाचा चाची नाना-नानी मुझे सिखाती रिश्तो की पहचान कराती माँ प्रथम गुरु बन जाती धरती पर सच्चा प्रेम देखना है तो माँ का रूप देखो स्वार्थ का पूर्णता त्याग मिलेगा ममता स्नेह दुलार मिलेगा कोई माता दरिद्र कुरुप जरा- जीण नहीं…






