• मेरा दिव्य संसार

    ‘मुक्त’

    कहा था,जब यह बारिश का कहर मुझ पर टूटे और मेरे पंख गिले हों जाएँ,बस कुछ क्षण के लिए साथ दे देना!परंतु, फिर से वही हुआ,भरती उड़ान में जाने कितने आगे पीछे और साथ रहे, इस बारिश में फिर से अकेला छोड़ दिया!!मैंने भी कहाँ हार मानी, बारिश डूबाने की कोशिश करती और हवा अपने साथ बहाते हुए फिर से आसमान की सैर कराती!!!पंखों को भिगोकर बारिश बार-बार ‘जगत मिथ्या’ से परिचय कराती,वहीं हवा ‘स्वयं’ से मिला ‘मुक्त’ एहसास दिलाती!!!!