मेरा दिव्य संसार

ज़रूरी था ठहरना

क्या ज़रूरी था ठहरना?
वहाँ, जहाँ कोई नहीं था
अकेले रास्ते पर नज़रें गढ़ाए
जहाँ से किसी के आने की
उम्मीद लगाए
कभी पलट कर, कभी दाएँ-बाएँ
पर कुछ नज़र न आए
क्या ज़रूरी था ठहरना?

एकाएक साँय-साँय की आवाज़
जैसे कोई तूफ़ान का आगाज़
अगले क्षण क्या होगा
पता नहीं
जो बीत गया
वह साथ नहीं
बस खड़ी
न किसी उम्मीद में
न किसी भय में
सिर्फ मैं और वह सन्नाटा
और मैं भी कहाँ
उस सन्नाटे में
खो जो चुकी थी
था तो बस वह ‘एक’
जो ‘परम्’ है
उसकी आवाज़, उसका एहसास
और उसका साथ
इसी सन्नाटे में है
हाँ ज़रूरी था ठहरना!
बहुत ज़रूरी था ठहरना!!

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