लेख

स्वाधीनता के अज्ञात वीर : ‘स्वयं’ के रक्षक

जीवन आनंदमय है। आनंद की अनुभूति तब होती है जब आत्मसंतुष्टि होती है। जब साधक, त्याग और तप द्वारा ‘स्वयं’ की अनुभूति कर लेता है तब उसे यह भी ज्ञान हो जाता है कि ‘मैं’, ‘वह’ और ‘हम’ भिन्न नहीं है। दूसरे का कष्ट, स्वयं का लगता है। दूसरे का बंधन, अपना लगने लगता है। उसी कष्ट और बंधन से मुक्त कराने हेतु वह स्वयं का बलिदान करने के लिए तत्पर हो जाता है। वहाँ कोई स्वार्थ नहीं होता, बस एक उद्देश्य होता है, ‘मुक्ति’।
स्वयं की मुक्ति और आत्मानंद प्राप्त हेतु कितने ही वीरों ने इस मुक्ति के हवन में अपनी आहुति दे दी। उस हवन की ज्वाला में ही बंधन की रस्सी जलकर खाक हुई, जिसके कारण आज हम अपने जीवन के स्वयं अधिकारी हैं और किसी भी प्रकार के निर्णय लेने के लिए स्वतंत्र हैं।
राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी कहते हैं –
“हुई न यों सु-मृत्यु तो वृथा मरे, वृथा जिये, मरा नहीं वही कि जो जिया न आपके लिए।
यही पशु-प्रवृत्ति है कि आप आप ही चरे, वही मनुष्य है कि जो मनुष्य के लिए मरे।” 
सन् 1925 में मात्र 17 वर्ष की आयु में काकोरी कांड में भाग लेने वाले ‘मन्मथनाथ’ की आयु कम होने के कारण 14 वर्ष की सजा मिली, बल्कि अन्य साथियों को फाँसी दे दी गई। वे कहते हैं – “न गांधीवाद है, न क्रान्तिवाद है, केवल है तो स्वतंत्रता-संग्राम में मर मिटने की चाह। हमें बड़ा दर्द होता है जब क्रांतिकारी शहीदों को और सत्याग्रही शहीदों को अलग करने दिखाने की कोशिश की जाती है।” 
हमारे देश के अनेक वीर सपूतों के बलिदानों को छिपाया गया, नकारा गया और उन्हें भुला दिया गया। स्वयं महान क्रांतिकारी मन्मथनाथ अपनी कलम से लिखते है – “गाँधी जी केवल उन कैदियों को ही छुड़ाने की बात करते थे जो सत्याग्रह में जेल गए थे। ऐसे समय में हम लोगो को तो सात-सात, आठ-आठ साल से जेल में बैठे हुए थे, बड़ा दु:ख होता था, यह जानकर कि हमें इतना अछूता समझा जा रहा है कि दुश्मन से भी कहा जा रहा है कि तुम इन्हें अछूता मानो, ऐसा दुश्मन जो स्वयं हिंसा का सबसे बड़ा प्रतीक था।” 
कितने ही वीरों के नाम इतिहास के पन्नों से फाड़ दिए गए; मिटा दिए गए; आज उनका नाम भी नहीं मिलता, मन्मथनाथ आगे लिखते हैं – “न उन्हें इसका कोई पुरस्कार मिला, न उनके नाम पर कोई नगर बसाए गए, न भवन बनाए गए, फिर भी वे थे और रहेंगे। हमारे मन की पृष्ठभूमि में ही सही, रहेंगे और वहाँ से हमें आलोक प्रदान करते रहेंगे।” 
सजने-संवरने की उम्र में मात्र 17 वर्ष की नागालैंड की रानी ‘गिडालू’ ने 1932 में अंग्रेज़ों के विरुद्ध ऐसा युद्ध छेड़ा कि अंग्रेज़ उन्हें अपना सबसे बड़ा शत्रु मारने लगे। 26 जनवरी, 1915 में नागालैंड के घने जंगल में गिडालू का जन्म हुआ। वह आदिवासी कबीले की एकमात्र लड़की थी। सन् 1931 में मात्र 13 वर्ष की आयु में उनके छोटे भाई ‘जादोनांग’ को एक अंग्रेज़ हत्या के अपराध में फाँसी की सजा दे दी गई। इस घटना ने गिडालू को पूरी तरह बदल दिया। उसके पास 4000 नागा अनुयायियों की सेना थी। लंबे समय तक उन्होंने अंग्रेज़ों को छकाया। रानी ने घोषणा की – “या तो अंग्रेज़ जीतेंगे या मैं।” 
17 अक्टूबर 1932 को अपने अनुयायियों का सैनिक घेराव के होने कारण, मजबूरी में गिडालू को आत्मसमर्पण करना पड़ा। रानी का कहना था – “मैं उनके लिए जंगली जानवर के समान थी इसलिए एक मजबूत रस्सी मेरे कमर में बांधी गई।” 
गिडालू 1947 देश स्वतंत्र होने के बाद रिहा कर दी गई।’ महिला स्वतंत्रता सेनानी महिलाओं में सर्वाधिक लंबी सजा काटने वाली गिडालू ऐसी लड़की थी, जिसने अपना पूरा यौवन राष्ट्र हेतु न्योछावर कर दिया।
महाराष्ट्र के ‘दामोदर’, ‘बालकृष्ण’ और ‘वासुदेव’ तीनों भाइयों के रास्ते भिन्न-भिन्न थे, परंतु लक्ष्य एक ही था। दामोदर कुश्ती-अखाड़े में शौक रखते था। उसने अपने अखाड़े के जरिए देशभक्तों की संस्था बना डाली। हथियार इकट्ठे किए और उन्हें प्रशिक्षण देने लगे। युवकों का मात्र एक ही उद्देश्य था, अंग्रेज़ों को मारकर भगा दिया जाए।
अंग्रेज़ों के विरुद्ध आवाज उठे, 40 वर्ष बीत चुके थे अंग्रेज़ों ने सोच लिया था कि भारतवासी उनके गुलाम रहने वाले हैं कि अचानक सब कुछ बदल गया। 22 जून, 1897 महारानी विक्टोरिया का 60वाँ राज्याभिषेक दिवस मनाया जा रहा था, गोलियों की आवाज़ ने आनंद में विघ्न डाल दिया और एक ऐसी चिंगारी उठी जिसने फिर से सोए हुए भारतीयों के दिल और दिमाग में अंग्रेज़ों के विरुद्ध आग लगा दी। दामोदर चाफेकर पकड़े गए। उन्होंने स्वीकारा कि “इस घटना से पहले मुंबई में महारानी विक्टोरिया की मूर्ति के मुँह पर कोलतार पोतने वाला वही था। इसमें उसका उद्देश्य यह था कि ‘आर्य भ्राताओं’ के दिल में उत्साह की लहर पैदा हो और हम लोग विद्रोह का टीका माथे पर लगाएँ।” 
दामोदर को फाँसी की सजा हुई। फाँसी घर से उन्होंने तिलक जी द्वारा लिखी गई ‘गीता’ भेजने का आग्रह किया। फाँसी वाले दिन उनके हाथ में गीता थी और वे दोहरा रहे थे –
“देहिनोऽस्मिन यथा देहे कौमारे योवनं जरा।
तथा देहान्तरप्राप्तिर्धीरस्तत्र न मुह्यति।।” 
अन्य दोनों भाइयों ने भी अपने भाई की तरह अपने जीवन को मातृभूमि हेतु त्यागने का निर्णय किया। अंततः बालकृष्ण और वासुदेव भी पकड़े गए, उन्हें भी फाँसी की सजा हुई। यह देख देश के नौजवानों का रक्त तीव्र गति से दौड़ने लगा। जब तीनों भाइयों को फाँसी की सजा हुई, वे बहुत कम उम्र के थे। उनके इस बलिदान हेतु महान वीर सावरकर ने लिखा है –
“तीन क्या है, यदि हम सात भी होते, तो हम हवनकुंड में अपना सिर चढ़ा देते।
हे माता! तेरी मुक्ति के लिए हमें यदि अपने को होमने का मौका मिले, तो यह हमारे लिए सबसे बड़ी खुशी की बात होगी।” 
सन् 1908 में ऑफिसर ‘ऐश’ के कारण भारतीयों की मृत्यु और उसके बाद स्वतंत्रता सेनानी ‘सुब्रमण्यम सिवा’ और ब्रिटिश के विरुद्ध जाकर पहली भारतीय स्वदेशी नेविगेशन कंपनी के जनक ‘वी.ओ. चिदंबरम पिल्लई’ की गिरफ्तारी ने शेनकोट्टई (तमिलनाडु व केरल की सीमा पर) के वीर ‘वांचीनाथन’ के अंदर ऐसी ज्वाला पैदा कर दी कि उन्होंने उससे बदला लेने के लिए योजना बनाई। 17 जून,1911 जब ऐश रेल द्वारा ‘कोडाईकनाल’ के लिए यात्रा कर रहा था तभी मनिआच्ची जंक्शन पर मात्र 25 वर्ष की आयु के वांचीनाथन ने ऐश को गोलियों से दाग दिया। वांचीनाथन को पता था कि वे पकड़े जाएँगे और साथ में उनका साथी भी, इसीलिए उन्होंने स्वयं को गोली मार ली। उनके पॉकेट से एक पत्र मिला, जिसमें लिखा था – ‘भारत स्वतंत्र होना चाहिए। मैं अपना शरीर और आत्मा अपने देश के लिए समर्पित कर चुका हूँ।’  यह घटना स्वतंत्रता संग्राम के इतिहास को एक नया मोड़ दे दिया।
जब देश स्वतंत्रता की सांस लेने के लिए तड़प रहा था। भारत-माता के लिए अपने जीवन को समर्पित कर, जेल में बंद होकर भी, वे विचारों के पक्षी द्वारा नौजवानों को अपने उत्तरदायित्व का एहसास करा रहे थे। ऐसा ही एक पत्र 19 अक्टूबर, 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त द्वारा जेल से पंजाब छात्र संघ, लाहौर के दूसरे अधिवेशन के लिए भेजा गया और इस अधिवेशन के सभापति स्वयं नेताजी सुभाष चंद्र बोस थे। ‘विद्यार्थियों के नाम पत्र’ जिसमें लिखा था – “इस समय नौजवानों से हम यह नहीं कह सकते कि वे बम और पिस्तौल उठाएँ।…राष्ट्रीय इतिहास के इन कठिन क्षणों में नौजवानों के कंधों पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी आ पड़ी है। क्या परीक्षा की इस घड़ी में वे उसी प्रकार की दृढ़ता और आत्मविश्वास का परिचय देने से हिचकिएँगे? नौजवानों को क्रांति का संदेश देश के कोने-कोने में पहुँचाना है।” 

कुछ ऐसे अमूल्य क्रांतिकारी शब्द होते हैं जो समय के साथ कभी नहीं बदलते, परंतु बदलते समाज में क्रांति अवश्य ला देते हैं। लाहौर के कारागार में बंद क्रांतिकारियों को अचानक अलग-अलग जगह पर भेजा जाने लगा। उनमें ही एक थे ‘शिव वर्मा’ जो अपने संस्मरणात्मक रेखाचित्र में लिखते हैं कि जब कोठरियों को खोला गया, तब उनसे अपने तीनों साथियों से मिलने के लिए पूछा गया। दरोगा ने उन्हें भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु की कोठरियों के सामने ले जाकर खड़ा कर दिया। वे बताते है कि “वह हमारी आख़िरी मुलाकात थी। जिंदगी में यह लोग अब फिर देखने को नहीं मिलेंगे, इस एक विचार से सबके चेहरे उदास थे। मेरी आँखों में आँसू देखकर भगत सिंह ने मुस्कुराते हुए कहा -” भावुक बनने का समय अभी नहीं आया है, प्रभात! मैं तो कुछ ही दिनों में सारे झंझटों से छुटकारा पा जाऊँगा, लेकिन तुम लोगों को लंबा सफ़र पार करना पड़ेगा। मुझे विश्वास है उत्तरदायित्व के भारी बोझ के बावजूद इस लंबे अभियान में तुम थकोगे नहीं, पस्त नहीं होगे और हार मानकर रास्ते में बैठ नहीं जाओगे।” 

उनके इन्हीं शब्दों ने उनके साथियों को आगे बढ़ने का हौसला दिया; अपना सर्वस्व त्याग कर भारत माता के प्राणों की रक्षा की।
स्वतंत्रता के लिए कितने ही वीर नौजवानों ने अपने सांसारिक सुखों को त्याग दिया, यहाँ तक कि अपने परिवार से भी मुँह मोड़ना पड़ा। इन वीरों का एक ही उद्देश्य एवं जीवन का एक ही लक्ष्य था ‘भारत माँ की रक्षा’। यह रक्षा उस समय स्वतंत्रता के लिए थी परंतु आज भी देश को सुरक्षा की आवश्यकता है और वह सुरक्षा हमें ‘स्वयं’ की करनी है।

भारतीय संस्कार, संस्कृति और सभ्यता जो विश्व में श्रेष्ठ व प्राचीन माने जाते हैं, आज आधुनिकता की दौड़ में थके से प्रतीत हो रहे हैं। आज हमें अपने देश के लिए लहू बहाने की नहीं अपितु सुशिक्षित हो अपने श्रेष्ठ विचारों के साथ समृद्ध व श्रेष्ठ भारत बनाने की आवश्यकता है, जिसका उत्तरदायित्व हमारे वीर सेनानी एवं क्रांतिकारी, हमें सौंपकर गए हैं। अपनी मातृभूमि हेतु यथासंभव एक छोटे से छोटा योगदान, हमें संतोष एवं सार्थक जीवन की अनुभूति कराएगा।

वंदे मातरम्!

(राष्ट्रीय स्तर पर सम्मानित शोध आलेख, 2022)
संदर्भ सूची :-
1. मैथिलीशरण गुप्त, मनुष्यता hhtp://kavitakosh.org
2. मन्मथनाथ गुप्त, भारत के क्रांतिकारी
3. डॉ. राजेंद्र पटोरिया, आजादी के अनोखे व रोमांचक प्रसंग
4. मन्मथनाथ गुप्त, भारत के क्रांतिकारी
5. Vanchinathan, en.m.wikipedia.org
6. यादविंदर सिंह संधू, भगत सिंह जेल डायरी
7. शिव वर्मा, संस्मृतियाँ

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