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सागर में लीन
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सुखी और संपन्न भारत की प्रतीक : गौ माता
तुल्यनामानि देयानी त्रीणि तुल्यफलानि च।सर्वकामफलानीह गाव: पृथ्वी सरस्वती।। (महाभारत, अनु. ६९/४) अर्थात गाय, भूमि और सरस्वती, तीनों नाम एक समान हैं। तीनों का दान करने से समान फल की प्राप्ति होती है। यह तीनों मनुष्य की संपूर्ण कामनाएं पूरा करती हैं। परंतु आज ये तीनों दान लगभग समाप्त हो चुके हैं। शायद यही कारण है कि आज काल के विकराल रूप की भयावह स्थिति में सभी कामनाएं विफल हो रही हैं। जिस गृह में गौ माता का वास है, वहां कोई भी विषाणु का प्रवेश नहीं हो सकता। गाय के आसपास का स्थान सदा शुद्ध रहता है। वहाँ, गौमूत्र और गोबर से उत्सर्जित गंध, आस-पास की जहरीली वायु को अवशोषित…
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नाता
कहाँ किसका किससे क्या नाता है? एक आता और एक जाता है। बस एक तथ्य सत्य बताता है, हम सबको वो ‘एक’ ही बनाता है, इस नाते आपका और हमारा, बड़ा गहरा और दिव्य नाता है।
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जोड़
आज-कल सब कुछबिखरा-बिखरा नज़र आता है,‘जोड़’ तो बसदुगनी शक्ति को दर्शाता है।जुड़ते, जोड़ते यह शक्तियूँही बढ़ती रहे,यही भाव इस जग को सुन्दर बनाता है।
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नारी
रिश्ता है ना नाता हैफिर भी अपनाती हैएक बात पर वहअपने घर से दूसरे घर कीअपनी बन जाती हैहर रिश्ते को निभाती हैअपना सब भूल जाती हैऔर हम समझ ही नहीं पाते उसेजो स्वयं संसार को चलाती है….।
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*सत्य रूप छलता गया *
जब किया प्रवेश नव संसार में, शून्य थी विचार में, शांत थी स्वभाव में। खुले जो यह पटल, सब कुछ अनजान सा चौंधयायी मैं, पर कुछ था पहचान सा । स्पर्श जो हुआ, बदली फिर आकार में ध्वनियों ने ऐसे जगाया,खोई फिर से भाव में। वक्त रूप बदलता गया, मेरा भी रूप ढलता गया खोकर माया नगरी में , मेरा सत्य स्वरूप छलता ही गया।
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दीप जला
******************** कहाँ जलाऊं दीप, हर और उदासी छाई है। कहीं भ्रष्टाचार तो, कहीं गरीबी खाई है।। नफरत के अंगारों पर, कोई ना कोई जलता है। शोषण की इस अग्नि में, हर रोज कोई मरता है।। दीपक की ज्वाला भी, अब यह कहकर दहकती है- रख हौसला अपने दम पर, तूफानों से लड़ती हूं। सबको रोशन करती मैं, घनघोर अंधेरा हरती हूं।। स्वार्थ के बस में होकर तू, अपना अस्तित्व मिटाता है। भरा अंधेरा अंतर्मन में, किस भाव का दीप जलाता है? प्रेम हृदय में रख पहले, स्नेह भरा अब पर्व मना। सबकी रक्षा के प्रण हेतु, इस दीवाली दीप जला।। ********************
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ठहराव
कभी विचलन, कभी उथलापन, तलाश, एक ठहराव, शांत भांव …………….. । आंसमा की ओर झांकता, दूर वसुन्धरा को तांकता । भॅवर से उबरने की आस, न डूबने का आत्मविश्वास । वेग से आती वयार, ले जाती साथ, लौटाती खाली हाथ । गिरते – उठते तरंगों के पार, मानी अपनी हार । डूबी गहराई के जहन में, मुस्कुराई अब मन में, बाह्यी खोज भटकाव ! डूब स्वयं में, गहराई में ही ठहराव शांत सार ………………….. ।।
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बदल जाने दो सब
अपनी वाही-वाही के लिए लड़ते हो, कभी झूठ, कभी दिखावा का चोला पहनते हो, तुम्हारा साक्षी तुम्हें कैसे माफ करता है, सत्य जानकर भी असत्य स्वीकार करते हो। थोड़ा इतिहास के पन्ने पलट लो, ऑखें खोलो स्मरण कुछ कर लों भूखे लड़े, प्यासे मरे, इस देश के लिए हॅसकर फॉसी चढ़े, क्या रिश्ता था हमसे वाह ! क्या रिश्ता था वतन से । दूसरों के लिए जिए, जीवन हमें बता अमर हुए। और हम जीकर भी रोज मरते हैं, स्वार्थ के कीचड़ से, स्वयं को बदरूप, बदरंग और दुर्गंध भरते है । मानवता अब तो जगाओ । कब तक मुखौटा पहनोगे अब तो उतारो, अपने सत् रूप को जानो, पहचानो…
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मैं चलती हूं….
मुस्कुराता चेहरा बहते अश्रु, कपोलों से पौंछती उंगलियों से उठती कलम, प्रश्न करती स्वयं से चलूं या नहीं? कितना लिखा? क्या – क्या लिखा? सब कुछ लिखा…! किसने समझा? कितना बदला? आज भी सब वही है, वहीं हैं। मुखौटा पहने ये पुतला खुश करने का प्रयास, बेजान होकर भी दिखावे का ढंग जो भ्रमित कर खींचता अपनी ओर, वक्त की ढलती शाम में बदलता मुखोटे का रंग और पुनः उदास, थकी, ठहरती सी बस एक उम्मीद में, ‘सब बदलेगा‘ मैं चलती हूँ……..










